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08 July, 2015

उनसे भी मोहब्बत थी

आगे सफर था और पीछे हमसफर था....

रूकते तो सफर छूट जाता और चलते तो हम सफर छूट जाता...

मंजिल की भी हसरत थी और उनसे भी मोहब्बत थी..

ए दिल तू ही बता...

उस वक्त मैं कहाँ जाता...

मुद्दत का सफर भी था और बरसो का हम सफर भी था
रूकते तो बिछड जाते और चलते तो बिखर जाते....

यूँ समँझ लो....

प्यास लगी थी गजब की...

मगर पानी मे जहर था...

पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते...

11 April, 2012

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वो डे स्कोलर  थी  घर से कोलेज .......कोलेज  से घर ....उस उम्र की  ज्यादातर लडकियों की तरह .जो अपनी  माँ को दिन भर की   सारी बात बताती.है ...उन  सहेलियो  के साथ उसका ज्यादा वक़्त बिताती   जो स्कूल टाइम से उसके साथ थी ...टोपर खानदान की टोपर बिटिया ... कुल जोड़ निकाले तो  एक आदर्श  लड़की  ......ओर  वो हॉस्टल वाला था ...उसका अपना बिगडैल  गैंग ...पढाई में साधारण ....दुनिया की ज्यादातर  बुरी आदते उसमे थी ... .वो हमेशा अगली बैंच पर बैठती ओर वो पिछली दो बैंचो के दरमियाँ रहता....... वो हमेशा  क्लास टॉप करती  वो बमुश्किल पास होता वो अपने में सिमटी ओर वो  दुनिया भर के लिए खुला ...... अक्सर हॉस्पिटल  के बाहर वाले कोने में सिगरेट पीते कभी कभी दिख जाता या अपनी "गर्ल फ्रेंड" के साथ किसी पिक्चर हौल में .....उसकी  गर्लफ्रेंड जूनियर  बैच में थी  ...जो ज्यादा वक़्त जींस में रहती ...कोलेज के  सारे लड़के जिस पर  लट्टू रहते ...उसकी क्लास के भी ...कुल मिलाकर उन दोनों ने  आपस में  पूरे तीन सालो में शायद छह दफे बात की हो ..गोया वे न बेहद अच्छे दोस्त थे न दुश्मन .ओर हाँ उसे कभी प्यार नहीं हुआ था ओर वो आठवी क्लास में ही   अपने टीचर के प्यार की  पहली कम्पलसरी शर्त पूरी कर चूका  था .
नकी पहली मुलाकात ........जिसे मुलाकात कहा जा सकता है कोलेज के फेस्टिवल दिनों में हुई थी ..उस दिन वो जब घर से कोलेज के लिए निकली थी तो रेडियो पर "ओ हँसनी" बज रहा था  ......उसकी "गर्लफ्रेंड "घर गयी हुई थी ....  ...वो शायद .कही से भागा आया था हांफ रहा था .....तभी उसने उससे पूछा था
तुम मेरी पार्टनर बनोगी ?
गेम था  मेल पार्टनर की शेव बनाकर दौड़कर दूसरे किनारे जाकर एक मेडिकल  पज़ल सोल्व करनी है जो पहले करेगा वो जीत जाएगा .
"मैंने कभी शेव नहीं बनायी"
उसमे करना क्या है ...लेदर बना कर शेव करना है फटाफट .....कम ऑन !!
वो उसके साथ आयी है .
वो शेव करते वक़्त उसका चेहरा छील देती है ...पर पज़ल सोल्व पांच सेकण्ड में कर देती है
वे दोनों जीत गये है....उसे .उसके चेहरे पर खून देखकर अफ़सोस है  वो रुमाल से  पोछ रहा है.पर जीत से खुश है.
विनिंग गिफ्ट   है ...  शहर के  फेमस चाइनाइज़ रेसटरोनेंट में लंच के  दो कूपन अगले एक हफ्ते तक वेलिड है .
"सन्डे चलोगी .
"मम्मी से पूछना पड़ेगा सन्डे के लिए"
उसके दोस्त उसे आवाज दे रहे है,
"ये कूपन रखो ..अगर मम्मी हाँ बोले तो सन्डे मेरे साथ चलना नहीं तो अपनी किसी फेवरेट सहेली के साथ हो आना ...शनिवार को मेरा मैच है इंजीयरिंग कोलेज से ..
उसने सोच लिया था वो उसके साथ नहीं जायेगी ...कल ही उसे कूपन थमा देंगी .
अगले तीन दिन तक वो क्लास में नहीं आता .....अजीब अहमक है  उसे  गुस्सा आता है ....उसकी गर्लफ्रेंड दिखती है ..उससे पूछू क्या ? नहीं खामखाँ पता नहीं क्या सोचेगी ? पर ये है कहाँ ?
शनिवार सुबह वो अपना काइनेटिक कोलेज में पार्क कर रही है ....कोई  मोटरसाइकिल आकर रूकती है
क्या कहा मम्मी ने ? वही है
वो सर हिलाती है
गुड ....कैंटीन के सामने ठीक एक बजे .......फुर्र से मोटरसाइकिल से गायब .
अजीब आदमी है ! पता नहीं वो इसके साथ क्यों जा रही है .. अपनी गर्लफ्रेंड को क्यों नहीं ले जाता ! वो अपनी "बेस्ट फ्रेंड "की शरण लेती है . डिफेंसिव मत रहना ...."अटैक इस बेस्ट डिफेन्स " वो तुम्हारी आँखों की तारीफ़ करेगा ,तुम्हारे कपड़ो की ....तुम्हारी बात बात में तारीफ़ करेगा भाव मत देना .
सन्डे दोपहर एक बजे कोलेज कैंटीन के सामने
तुम्हारी गर्ल फ्रेंड शहर में नहीं है क्या
गर्लफ्रेंड ?
वो तुम्हारी गर्लफ्रेंड नहीं है ?
साथ घूमने से कोई गर्लफ्रेंड हो जाता है
वो उसे घूरती है ...आधा दिन तुम लोग साथ गुजारते हो .
हम्म .वो अपनी बाईक में झुककर नीचे कुछ चेक करता है
"साथ रहने से प्यार होने की प्रोबेबलिटी ज्यादा होती   है   ".....वो फिर कहती है
वो मुस्कराता है ."लडकियों में "
हाँ लडकियों में ...
जानती हो हम जिसके साथ वक़्त गुजारते है दिल के भीतरे हिस्से से उसके बारे में सब जानते है ."..सब !!
वैसे हम दोनों के बीच बहुत अच्छी अंडर स्टेंडिंग है वो किसी ओर को पसंद करती है ओर हम दोनों के बीच प्यार नहीं होने वाला
वो अब भी बाईक में नीचे झुक कर कुछ कर रहा है
तुम्हारे बारे में  ज्यादातर लोगो की राय अच्छी नहीं है
उसे लगा वो बाईक छोड़कर गुस्से में खड़ा होकर कुछ कहेगा .पर वो नीचे झुका हुआ कहता है
"ओपिनियन पोल" हाईवे के ट्रक ड्राइवर की तरह होते है ..उन पर एतबार नहीं करना चाहिए ...ओर  ये अच्छी  बुरी  चीज़े  बड़ी कमाल की होती है ... शायद पंद्रह साल बाद अच्छा" बुरा" हो जाए ओर बुरा "अच्छा "
फिर नजरे उठकर उसकी आँखों में देखता है ....कभी ड्राइव किया है हाई वे पर
फिर साथ क्यों घूमते हो
हम दोनों एक दूसरे की कम्पनी रेलिश करते है ....दैट्स ईट .
उसने रास्ते में कही ब्रेक नहीं मारे ...बाइक भी तेज नहीं चलायी...वो पिछला हिस्सा पकड़ कर  सेफ डिस्टेंस पर  बैठी रही .पर उसके ड्यू की खुशबु अच्छी है
उसकी बाईक   चाइनीज़ रेस्ट्रोरेन्ट  के बाहर आकर रुकी है
....तुम नॉन वेज खाती हो ?
आई  लव नॉन वेज .मम्मी के हाथ का खायोगे तो उंगलिया चाटते रह जाओगे
वो उसकी ओर देखता है " मैंने अभी अभी रेलिश करना  सीखा है ...एक सीनियर हाँ ओर ना के बीच था तो अपना दुःख बांटने के लिए यहाँ ले आता था.....मै सिर्फ सूप पीता ओर उसकी बात सुनता धीरे धीरे जब  टेस्ट डेवलप हुआ तो उसकी गर्लफ्रेंड ने हाँ बोल दी ओर .....आई ओ दिस टेस्ट टू देयर लव ...
"रेलिश "!! तुम चीजों को रेलिश बहुत करते हो
वो नोट  करती है ..... उसकी एक दिन की बड़ी दाढ़ी  है ग्रीन ग्रीन सी...... शेव बनाकर भी नहीं आया बेवकूफ ! वो होती तो ........
.रेस्तरा में "ओ हंसनी "का इंस्ट्रूमेंटल बज रहा है
मुझे ये गाना बहुत पसंद है वो कहती है
मुझे भी
वो बतलाना  चाहता है   वो अपनी  सो काल्ड  गर्लफ्रेंड के साथ दो बार आया है पर जाने क्यों रुक गया है .इस लड़की के अन्दर  एक अजीब सा इनोसेंस उसे पसंद है ...घर लौटते वक़्त वो याद करती है उसने उसकी तारीफ़ बिलकुल नहीं की वो अपने मैच , क्रिकेट ओर इन्जियार्निंग ओर मेडिकल कोलेज के फर्क की बात करता रहा.....ओर जगजीत सिंह के बारे में ......उसे गजले समझ नहीं आती .
ओ हंसनी मेरी हंसनी
उसके बाद ....उसके काइनेटिक के पास से कोई  तेजी से गुजरता  ओर जोर से   "हैलो"  कहकर डरा देता,
एक सन्डे वो सुबह सुबह  किसी गुरूद्वारे से निकालता  टकरा गया .....यहाँ  ?
गुरूद्वारे का प्रसाद बहुत अच्छा होता है ...उसने आँख मारी थी .....एक रोज शोर मचाने पर  उसे   क्लास से बाहर निकला गया ...बाहर कैंटीन के सामने वाली दीवार पर उसके पास गुजरते हुए उसने उसे कहा था "क्यों करते हो ऐसा "? बड़े अजीब ढंग से देखता रहा था वो बिना बोले उसे ...देर तक उसकी उन  आंखो ने पीछा नहीं छोड़ा था लड़की का .......दिलवाले  दुलहिनिया ले जायेगे  के टिकट लायी थी  उसकी बेस्ट फ्रेंड ...कितना खुश थी वे तीन चार सहेलिय ....पर पिक्चर हौल में उसे उसकी गर्लफ्रेंड के साथ देखकर जाने क्यों फिल्म में मन नहीं लगा था उसका .
तय कर लिया था उसने आगे से कभी बात नहीं करेगी उससे .
फिर उस रोज  पीठ पर कोई बैग  लादे सड़क पर बाईक  घसीटता मिला था ...क्या हुआ ?
कुछ गड़बड़ है मुझे आगे तक ड्रॉप कर डौगी... मकेनिक तक
वही ड्यू की खुशबु .
उसका बैग उसके पास रह गया था .किसी का बैग खोलना गलत बात है पर  रात को खोल ही लिया उसने .......
.दो  नयी  कैसट ..किशोर कुमार ओर जगजीत  , एक रजिस्टर ...विवियन रिचर्ड्स की बायोग्राफी ओर एक सिगरेट लाइटर.....उस रात वो देर तक  अपने बिस्तर पर वाल्क्मैन लगाकर  सुनती रही......सोते वक़्त आखिरी गाना  उसने दो बार सुना ......." ओ हंसनी .मेरी हंसनी "
AIIMS NEW DELHI
...दो दिन से बुखार था पर उसने पेरासिटामोल खा खा कर उसे चढ़ने नहीं दिया है ...मलेरिया की गोली भी खा ली है ..उसे यहाँ आना था ....पहली बार घर से इतनी  दूर निकली  है .बेस्ट फ्रेंड साथ है शायद इसलिए मम्मी ने भेज दिया है
देश भर के मेडिकल कोलेज  कल्चरल फेस्टिवल के लिए जुटते है ....उसकी गर्लफ्रेंड भी है पर उसकी  कोई रिलेटिव  है इसलिए रात को ही आती है...उस रोज सब कुतुबमीनार देखने निकले थे..... उसकी तबियत खराब हुई है ..वो उसे    छोड़ ने  आया है ऑटो से उतारते वक़्त वो चक्कर सा महसूस करती है इसलिए उसकी बांह पकड़ लेती है ....कोलेज में  आने के बाद भी वो उसे  गर्ल्स हॉस्टल नहीं ले जाता ग्रायूँड के ठीक सामने पड़ी पत्थर  की बेंचो पर दोनों बैठते है .बिना बात किये देर तलक ..वो  अपनी जेब में  हाथ डालकर अपनी हथेली फैलाता है .
"खाओगी "इन्हें हमारे यहाँ बूंदी कहते है
बूंदी ...वो पीले रंग के उन दानो को देखती है
जानती हो मै बचपन में एक वक़्त में हलवाई बनना चाहता था .....फिर पाइलट  ओर कभी टीचर .......बचपन के  हमारे मकान तक कुछ  आवाजे    .गुरूद्वारे से   आती थी ..कितने घरो को पार करके .गली से मुडके उसकी खिड़की तक ..."गुरुबानी " है  दार  जी  ने  बताया  था  दार जी सब उन्हें  दार जी कहते थे .उनका सब कुछ सफ़ेद था दाढ़ी ,भौंहे , मूंछे सर की पगड़ी .उसके घर से  चौथे मकान पर रहते थे ..
."प्रार्थना रब से बातचीत का जरिया है ".वे कहते
"पर रब से रोज एक ही बातचीत क्यों होती है "  मै  उनसे पूछता था  तो वो जोर जोर से हँसते थे  दार जी बहुत अच्छे  थे हर मंगलवार  मुट्ठी खोलते तो  हाथ में बूंदी के बड़े बड़े दाने निकलते..
वो महसूस करती है जैसे वो एक छोटा बच्चा है ....अपनी  आँखों  में चमक लेकर कुछ कुछ  बताता है  .....वो उसके पास ओर खिसक जाती है
"पहली  बार  दार  जी  के  साथ  मैंने  गली  का  दूसरा  कोना  पार  किया  था  गुरूद्वारे  के  वास्ते   ...., हर इतवार  जानी पहचानी गंधे  वहां होती ....गंध   का भी स्वाद होता है शायद ......आलू की गंध  ,हलवे की गंध ,रोटी  की गंध .हर इतवार वहां मेला सा लगता .बड़ी बड़ी भट्टिया बड़ी बड़ी कढाईया . चने हलवे से मिलकर कितना अच्छा स्वाद देती है .माँ ऐसे कभी नहीं बना पाती .एक रोज पतंग लूटते लूटते मै   गाड़ी के टायर के बीच आ गया  ....पैर की हड्डी गयी ..दार जी सीडिया नहीं चढ़ सकते थे...नीचे खिड़की से आवाजे देते ...एक रोज मेरे सोते सोते  अपने रब के पास चले गए"
वो उसके   नजदीक हो गयी  है इतने की  उसके बदन की खुशबु महसूस कर सकती है .एक अजीब सी गंध ...भली सी ..कभी कभी आप बरसो किसी शख्स के साथ एक तय समय गुजार कर उसे जान नहीं पाते ...हर शख्स के कितने हिस्से है उसका  कौन सा हिस्सा कब खुलता है...वो उसकी बांह पकड़ कर उसके काँधे पे सर रखकर इस धूप में बैठना चाहती है ....बिना लोगो की परवाह किये.....दिल्ली की उस रोज की ये  धूप उसके भीतर तक उतरती है .
पंद्रह दिन बाद का कोई एक बुधवार
वो कैंटीन में उसके पास आयी है
"कैसी हो" वो पूछता है .उसकी ग्रीन दाढ़ी ओर ग्रीन लगने लगी है
वो उसे  घूर कर देखती है .....वो सैंडविच खाने में बिजी है" चाय पियोगी " वो पूछता है
उसे  गुस्सा आता है .उसकी सैंडविच की प्लेट अपनी ओर खींचती है
. .".क्या हुआ ?"
तुम्हे वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता ? वो गुस्से में है
किस बात का ?
मै पंद्रह दिनों से तुम्हे इग्नोर कर रही हूँ ...बात नहीं कर रही हूँ ..पूछोगे नहीं क्यों ?
वो उसकी ओर देखता है ...पर पूछता नहीं...... वो फिर भी बतलाती है
पंद्रह दिन पहले मै  गर्ल्स हॉस्टल में गयी थी वहां लडकियों ने कहा .वो रुक गयी है ....सर नीचे झुकाए.....".के तुम "..........तुम कई लडकियों ............
"के साथ सो चूका हूँ " वो चाय के घूँट पीता पीता उसकी बात पूरी करता है ..
वो हामी में सर हिलाती है
"बिना किसी की मर्जी के उसके साथ सोया जा सकता है ? वो चाय का आखिरी घूँट हुए पूछता है 
उसकी चाय आ गयी है .वो चाय में बेवजह चम्मच घुमा रही है .
तुम जिसे मेरी "गर्लफ्रेंड "कहती हो उसमे ओर तुममे यही अंतर है वो कभी मुझसे ये सवाल नहीं पूछती के मै तुमसे क्या बात करता हूँ  ....क्यों करता हूँ
" गर्लफ्रेंड "का बेवाज़िब जिक्र जाने क्यों उसमे गुस्सा भरता है .....तुम उसे हर बार  बीच में क्यों लाते हो ? वो घर से दूर हॉस्टल में है ....मै यहाँ लोकालाईट हूँ....मेरे अपने संस्कार है ....मेरी अपनी घर की कुछ वैल्यू .... मेरी अपनी इनहिबिशन ....मेरा अपना  नजरिया  है अच्छा ओर बुरा ....उसकी आवाज तेज हो गयी है ....कैंटीन में कुछ सर उनकी ओर मुड गये है
एक ख़ामोशी फिर उनके दरमियाँ पसर जाती है
इमोशन हमें "रिड्यूस" करते है....वो कहता है ...फिर उठ गया है ..
.वो  परेशां हो गयी है .वो यहाँ लड़ने नहीं आई थी
वो बाईक स्टार्ट कर रहा है ...वो कैंटीन से बाहर  निकल उसके पीछे पीछे आयी है .उसे "सोरी "कहना चाहती है
पर वो गुस्से में है
"हो सकता है वो  बुरी हो ,पर उसमे एक अच्छी बात है उसने कभी तुम्हे" बुरा "नहीं कहा ......उसके  पास अच्छे बुरे की कोई लिस्ट नहीं है जिसके साइड बार में राईट  का ऑप्शन हो .........ओर हाँ मै "वर्जिन" नहीं हूँ !
वो बाईक स्टार्ट करके चला गया है ओर वो रो पड़ी है
ये प्यार भीतर से बीहड़ ओर खुरदुरा जंगल है जहाँ कई जगह अकेलापन है !
गर याद रहे
इक्जाम ख़त्म हुए है . इंटर्नशिप के पहले छह  महीने इधर उधर की पोस्टिंग में निकल गए है ....अगले तीन महीने की
पोस्टिंग  उसने   दिल्ली ली है कहता है पापा का ओपरेशन होना है .इसलिए उसे तीन महीने वही रहना पड़ेगा इधर वो अपने लिए आये सब रिश्ते वो मना करती है ...एक...दो...तीन !
एक रिश्ता बाहर का है ,माँ के मन में वही अटका है
कही  तुम उससे प्यार  तो करने नहीं लगी ?
नहीं ! वो अपनी माँ से कहती है
शायद ! वो अपनी  बुआ से कहती है
"हाँ" वो अपनी बेस्ट फ्रेंड से कहती है
"उसे मालूम है "?उसकी बेस्ट फ्रेंड पूछती है
शायद !
ओर वो तुझे प्यार करता है ?
शायद ?
"शब्बा खैर " उसकी बेस्ट फ्रेंड सांस लेती है
वो तुम्हारे लिए राईट चोयेस नहीं है ....उसकी बेस्ट फ्रेंड उसे कहती है ....उसकी बुआ भी ......बिना पूछे उसकी माँ भी .....उसका दिमाग भी !
बस उसका दिल अलग बाते कहता है
कुछ दो  महीने अट्ठाईस दिन  कितने अलग होते है
"वो मेरे ज़ज्बात के आधे हिस्से पर  एक वक़्त से  काबिज़  है  बिना मेरी मर्जी के ."वो ट्रेन में अपनी गर्लफ्रेंड से  उसके बारे में कहता है
तुम उससे कह क्यों नहीं देते
मै उसे डिज़र्व नहीं करता ...वो बहुत अच्छी है . मै उसे खराब नहीं करना चाहता
" ओर तुम बहुत बुरे " .पागल ! दिक्कत ये है के उसके दोस्तों की तरह तुमने भी उसे  अच्छा होने का टैग लगा दिया  है ..सब वक़्त को वही पॉज़ कर रहे है  .वो  उसे  उसी तरह से देखना चाहते है जिस तरह से  बरसो से देखते आये है ...सब भूल गए है  उसके पास भी इमोशन है...... नोर्मल इमोशन
वो अपनी दोस्त की बात सुनता है ....ट्रेन के दरवाजे पर खड़े सिगरेट पीते पीते सोचता है   कॉलेज पहुँचते ही उसे कह देगा !!
दो दिन से उसे ढूंढता है.....
वो लॉकर रूम के बाहर दिखती है .अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ
  हाय ....कहाँ हो यार तुम
वो जवाब नहीं देती .उसकी बेस्ट फ्रेंड जवाब देती  है
एक गुड न्यूज़ है ...... इसकी शादी तय हो गयी है ....अगले  तीन महीने  में अमेरिका जा रही है अभी सारे सरटीफिकेट इकठ्ठा करने है ओर तैयारी भी
.वो  सर झुकाए  खड़ी है
वो कोंग्रेट्स  नहीं कहता
उसकी बेस्ट फ्रेंड आगे बढ़ गयी है ... आवाज दे रही है ....वो उसे देखना भी चाहती है पर अपनी आँखे दिखाना नहीं चाहती .आहिस्ता आहिस्ता चल देती है ......डरती है..  वो  अभी पीछे से आवाज देगा ....रोकेगा ...पर .वो कुछ कहता नहीं .पार्किंग में अपने काइनेटिक के पास आकर वो रोती है .
कहते है उसके बाद उस लड़के ने  कभी प्यार नहीं किया ,वो कोलेज की  किसी लड़की के साथ नहीं सोया ,  कोई मैच नहीं खेला ... हॉस्टल  वाले  कहते थे  अगले तीन साल हर सुबह उसके रूम में सबसे   पहला  गाना बजता "ओ हंसनी "!
विलुप्त नहीं होता प्यार ...न बंद होता किसी पैराग्राफ की आखिरी लाइनों में ......फुलस्टॉप लगाकर ,
बचा रह जाता है मेरे तुम्हारे भीतर थोडा थोडा .!!

(.ओर हाँ किसी भी कथा के पात्र काल्पनिक नहीं होते प्रेम कथाओ के तो बिलकुल नहीं)

"चल  दिए  वो  हमको  भुलाकर 
भरी  महफ़िल  में  हमको  रुला  कर 
अब  तो  और  निखर  गए  है  वो 
काजल  जो  लगाया  है  मेरे  दिल  को  जला  कर ..."

23 April, 2011

कभी चलना आसमानों पे ...मांजे की चरखी ले के ...


खांसते बच्चे . ओर  बूढ़े मोहल्ले एक से लगते है
मै जब बड़ा हो जाऊंगा....बस अड्डे के पास मकान नहीं बनाऊंगा ......मै रजाई से मुंह निकालकर  करपापा से कहता हूँ...किसी फाइल में डूबे  पापा सिर्फ" हूँ "करते है ... सवेरे सवेरे  हमारे उठने से पहले पापा रोज दिल्ली जाते है ......रात देर में  घर आते है ...मै अक्सर कोशिश करता हूँ उनके आने तक जगा रहूं...उन्हें पतंग पसंद नहीं है ... मां सुबह जल्दी उठ जाती है ...दिन भर काम करती रहती है. ...मुझे  पतंग उडानी बहुत अच्छी लगती है ..आज मैंने पहला  पेचा काटा है ....वो भी राजू भैय्या  का ..राजू भैय्या बहुत अच्छी पतंग उड़ाते है ..पापा को पतंग क्यों पसंद नहीं है ?...
मां से मंजे के लिए  पैसे मांगू तो कहती है सारे खर्च हो गए ...मेहमानों के बिस्किट लाने में ...मेहमान .रोज  आते है ..ढेर सारे!!  बस अड्डे के पास हम  रहते  है  …किराये  के  मकान  में  … थापर नगर गली नंबर चार में……बस अड्डे से मोहल्ले में खुलती  गली जिसकी एक  दीवार पर ना जाने कौन  फिल्मो के पोस्टर चिपका जाता है   ...थोडा आगे चलकर एक मंदिर....जिसका लाल आँखों वाला  पुजारी  मुझे  उछल  कर घंटा बजाने पे घूरता है ....मुझे मन्दिर आना पसंद नहीं है पर  स्वेटर वाली आंटी आम पापड़ का मीठा पेकेट देती है ..इसलिए उनके साथ आता हूँ……..गाँव सेमेरठ  चले   किसी  भी  काम के वास्ते चले  शख्स   की    ..हमारे घर  हाजिरी   तय    है  ……..... मम्मीपापा किसी ज़मीन की बात कर रहे   है ... ..मुझे   नींद ने घेरना  शुरू किया है ....मै जगे रहने की कोशिश  कर रहा हूँ...बीच बीच में कुछ आवाजेसुने देती है ...पैसा .लोन...ढाई सौ गज...आहिस्ता - आहिस्ता   सारी आवाजे खो  जाती  है  … … कोई मुझे  रजाई  उड़ाते वक़्त  प्यार कर रहा है ..चुभती  दाढ़ी ...पापा है .....
उम्मीदों के आसमान  में यकीनो  के मांजे
सुबह  उठता  हूँ पापा  चले  गए  है  … मां  उन की केप   पहना  रही  है  ..मुझे  केप  पहनना पसंद नहीं ..बाल कैसे चिपके चिपके से हो जाते है 
"मुझे  मंजा  लाना  है  मम्मी " …….... मां जैसे सुनती नहीं ...सीधे केप से  कान ढँक देती है ....स्कूल   पास  ही  है .. मै पैदल  चल कर जाता हूँ..... स्कूल के नीचे बायीं ओर एक पोस्ट ऑफिस है ..जिसमे काम करने  वाले सारे बूढ़े है ..सब के सफ़ेद बाल है  ...दाई ओर एक नाई की दूकान है जिसे चलाना वाला कोई रिटायर्ड फौजी है ... उसे  "कटोरा कट" काटने में बड़ा मजा आता है ..छोटे छोटे बाल...मां अक्सर उसकी धमकी देती है.......गेट   पर   देव  खड़ा  है .... ऊँचा  है ओर मोटा भी...आते जाते  मेरी केप उतार देता है .....मुझे  उससे  डर  लगता  है  ..ओर मुझे वो  पसंद नहीं .....मै साइड  से  निकल  जाता   हूँ ...आजकल  विनीत  मेरा  नया  पार्टनर  है ....अपने हाथ में वो एक लाल रंग की गाड़ी मुट्ठी में दबाये रखता है ..क्लास शुरू होते ही उसे बेग की जेब में रख देता है ....
...लंच  में  .. मै टिफिन खोलता हूँ....आलू ओर परांठा है .. मां.  रोज रोज  बस आलू ओर परांठे  देती  है .....जिस रोज आलू नहीं ..उस रोज अचार ...अचार का तेल टिफिन से निकलकर ..सब कुछ पीला कर देता है ..मेरा बेग भी.....विनीत ने अपना टिफिन खोला है ..उसका सफ़ेद परांठा है...प्याज ओर टमाटर बीच में ...".खायेगा '.विनीत मुझसे पूछता है ....वो  मेरा बहुत अच्छा  वाला दोस्त नहीं है ..पर उसका परांठा !!!......मै आधे  से  ज्यादा  खा  जाता  हूँ…....उसका   "सफ़ेद परांठा"  कितना  अच्छा  है  !
लंच  के  बाद   अगला  पीरियड   हिस्टरी  का  है ….मेरा  कुछ  होम  वर्क  बाकी  है  ..मै  विनीत  की  कॉपी   से   कर  रहा  हूँ ….देव ने   मेरी  केप  उतार   ली  है ….मै  उससे  लेने  की  कोशिश  करता  हूँ उसने मेरी हिस्टरी  की कोपी  उठा ली है....वापस लेने में ….  हिस्ट्री की कोपी फट गयी है ...होमवर्क का चेप्टर भी......
 पीरियड में  . हिस्ट्री की मैडम  मुट्ठी बंद करवा के  स्केल को खड़ा करके मारती है ....बहुत जोर से लगती है...सीट पर जाकर आंसू पोछता  हुआ मै सोचता हूँ..टीचर बना तो बच्चो को नहीं मारूंगा !
स्कूल से लौटता हूँ तो सीडियो पर मुड़ी तुड़ी अधजली .बीड़िया देख मुझे गुस्सा आता है   .. मां रोज की तरह कुछ बनाने में जुटी है .. कितना बड़ा गाँव है ?

उन दिनों सब  लोग एक से  थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब...
 उस रोज  "स्वेटर वाली आंटी" ने ..मुझे ओर छोटे को  सुबह खाने पर बुलाया है ..वो  सर्दियों में बहुत सारे स्वेटर   बुनती  है .....इसलिए उन्हें सब स्वेटर वाली आंटी  कहते है ....वे  बहुत अच्छी  है .. हमेशा प्यार करती है  .सुबह के स्कूल में अभी  टाइम है ...वहां  पहुँचता हूँ  तो देखता हूँ  बहुत सारे बच्चे है पूरी ..काले छोले..ओर हलवा ...काले छोले मुझे बहुत अच्छे  लगते है कई दिनों से आंटी मंदिर नहीं गयी  .... आंटी का पेट फूला हुआ है .
"आप बीमार हो'.....मै पूछता हूँ...
वे हंसती है ...ओर मेरे सर पर हाथ फेरती है.ओर थोडा हलवा मेरी प्लेट में डाल देती है .
"आंटी   के  पेट  में  बेबी  है "बराबर में बैठी .रविंदर  कौर  मुझे  धीमे  से बताती  है  ….रविंदर  कौर  गली  नंबर  तीन  में  रहती  है ...बड़ी होशियार है ..नेल कटर से नेल  काटती है .(   पापा अपने  ब्लेड से  नेल  काटते  है ) उसके  घर  में  एक  बड़ा  डौगी  है ….जब  कभी  "लंगड़ी - टांग"  में  उससे  लड़ो तो  वो  बहुत  जोर  से  भौंकता  है  ….
पेट  भर गया है ...ऐसा  जैसे  फट जाएगा .... ..स्कूल पहुँचता हूँ तो देखता हूँ एक कोने में भीड़ जमा है ...विनीत केहोठो पर खून है ....देव   ने उसे मारा है....देव के हाथ में उसकी गाडी है ...विनीत.  रो रहा है . .....किसी ने मुझे देव की ओर धक्का दिया है ...."तू लडेगा" ..देव मेरी ओर बढ़ा  है ...मेरी घिघ्घी  बंध आयी है ...देव ने हाथ घुमाया है...मै पीछे हट गया  हूँ फिर  जाने  क्या  हुआ  है  के  मैंने  घूंसे  बरसाने  शुरू  किये  है  …लगतार  ….देव  गिर  गया  है  …..मुझे लगता  है   काले  छोलो   ने  मुझमे  ताकत  भर  दी  है  .....
स्कूली ड्रेस में भी सारे बच्चे एक से लगते है
सुबह उठा  हूँ... वीर सिंह अंकल आये है ....चंडीगढ़ से ....मेरे लिए हमेशा  कोई  किताब लेकर आते है ..... पापा बताते है बचपन के दोस्त है …. एक ही गाँव से निकले चंडीगढ़  से वे जब भी सन्डे को  आते है ..पापा उनके साथघंटो चेस खेलते है ..........रात को वीर सिंह अंकल मुझे कहानिया सुनाते है
.अगले  दिन  विनीत ने  मुझे घर पे बुलाया है....वो गली नंबर पांच में रहता है....उसके पास मांजे  की एक चरखी है ...बहुत सारी पतंगे ...हम उसकी छत   से पतंग   उड़ाते है ..उसकी मम्मी  नीचे   बुलाती है ...प्लेट में गरम गरम सफ़ेद परांठा है ...ब्रेड के साथ.......मै पूरा खा जाता हूँ..... ….ओर ऑमलेट  खायोगे बेटेउसकी मम्मी पूछ रही है ....ऑमलेट !!!!!..मैंने अंडा खाया है ....मै डर गया हूँ.....नहीं ...मै कहता हूँ....वापस लौटते वक़्त मन में अजीब सा गिल्ट है ..... घर जाने से पहले गली नंबर  तीन के  अस्पताल के नल से मुंह धोता हूँ....  मम्मी को नहीं बतायूँगा..बहुत मार पड़ेगी  
रात को वीर सिंह अंकल मुझे एक कहानी सुनाते हैवे कहानिया लिखते भी है ..."मै भी बड़ा होकर कहानिया लिखूंगा" ....मै उनसे कहता हूँ....
सपने में उनकी कहानी के साथ ऑमलेट भी आया है !
दो रोज से   मै  विनीत  के घर नहीं गया हूँ... ...तीसरे दिन विनीत   मुझे बुलाने आया है....मै शर्त रखता हूँ ऑमलेट नहीं  खायूँगा .......फिर कई दिन .रंग बिरंगी पतंगों.में बीतते है ... हाथ की अंगुलिया काटने लगी है मंजो से .... उसकी मम्मी ब्रेड सेंडविच बनाने लगी है ....उनके यहाँ की  ब्रेड कितनी मुलायम होती है न ...साफ सुथरी  कोनो से कटी हुई.....आठ दिन बाद बसंत है ...पतंगों का त्यौहार ... हम ने  उस दिन के लिए  एक रुपये वाली बड़ी पतंग भी खरीदी  है....".सरदारा "….
वक़्त के कन्ने कटते है जब ..
अगले रोज  विनीत  स्कूल में नहीं आया है ....दोपहर को मै उसके घर जाता हूँ....उसके यहां सामान की पेकिंग हो रही है ....पापा का ट्रांसफर हो गया ..वो बताता है ...उस रोज हम छत  पर पतंग नहीं उड़ाते...न सेंडविच खाते ...दोदिन बाद उसे जाना है ...वापस लौटते वक़्त  मै सड़क के कई पथ्थरो पर ठोकर मारता हूँ...  घर आकर मां से झगड़ता  हूँ..बिना खाए सो जाता हूँ....
सुबह जल्दी आँख  खुली है .पापा तैयार  होकर चाय पी रहे है .ये ट्रांसफर क्या होता है पापा ....मै पापा से पूछता हूँ.....वे कुछ समझाते है .जो मेरी समझ नहीं आया है........
क्या आपका भी होगा ?..मै पूछता हूँ......वे हाँ कहते है ....जाते वक़्त मुझे प्यार करते है ......
मेरा स्कूल जाने का   मन नहीं है ......मां गुस्सा होकर तैयार करके भेजती है .स्कूल में मन नहीं लगा है ...लौटा हूँ तो मां बताती है ... विनीत आया था..मुझे घर पे बुलाया है ...
मै उस रोज उसके घर नहीं गया हूँ...मां के कहने पर भी नहीं.... आज फिर मां से लड़ा हूँ कई बार
.. अगले दिन सुबह  मुझे ठण्ड  सी   लगती है ....स्कूल   में सब कुछ सुस्त सुस्त सा है ...मेरे सर में बहुत दर्द है....आज घर बहुत दूर  लगा है ......सीढियों पर चढ़ते चढ़ते  रुक गया हूँ... .मां दौड़ी आयी है ....कहती है मुझे बुखार है ...रोते हुए प्यार करती है ....मै जब भी बीमार होता हूँ..मां बहुत प्यार करती है .....दवाई के साथ वो  मुझे ग्लूकोज़ का बिस्किट भी देती  है..मै दवाई लेकर  सो गया हूँ.....  घंटो  सोया हूँ...उठता हूँ....तो कमरे  के बाहर में हवा के साथ अजीब सी आवाजे सुनाई  दी  है .जानी पहचानी ... क्या .पापा छुट्टी लेकर आये है.?... ...."..मां "मै आवाज देता हूँ.....मां के हाथ में ढेर सारी पतंगे है ओर हुचकी है .....बताती है विनीत आया था....छोड़ गया है... पापा कमरे के कोने में कोई कटोरी लेकर खड़े है ...गाजर का हलवा है ...मेरी फेवरेट डिश हवा से एक पतंग बाहर निकल कर गिरती है…|

22 April, 2011

एक चौरस खिड़की...वक़्त की, उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है .....


पैर के  नीचे तकिये को ठीक करके मैने उचककर  उस खिड़की से नीचे झाँकने की कोशिश की है  .....एक पतंग  कटकर गिरी है ....बड़ी वाली.गिलासटा ..दोमिनट हो गए है कोई लेने नहीं आया ....पिछले दस दिन से वही खिड़की  मेरी बाहरी  दुनिया है ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती  है .मै स्केल लेकर  खुजाता हूं ...मां अभी भी काम से लगी है   .जब से  पैर  में प्लास्टर चढ़ा है वो मुझे ज्यादा प्यार करने लगी है ...ग्लूकोज़ के बिस्किट देती है.....नीचे बहादुर से कंचे वाली बोतल भी मंगा कर देती है ....मुझे कंचे वाली बोतल बहुत अच्छी लगती है . बड़ी साइकिल चलाते चलाते मुझे चोट लगी है ..दाये पैर  में फ्रेक्चर है ....सुनील भैय्या ने टेप चला दिया है ....
गली नंबर चार ...थापर नगर के उस बड़े मकान के वो चौथे किरायेदार है ..आमने सामने दो  मकान ऊपर .दो नीचे ...पापा मां को बताते है ...पकिस्तान   से   आये पंजाबी शरणार्थियो ने  ये मोहल्ला   आबाद किया है ....मै    पापा से  "शरणार्थी "का मतलब पूछता हूं .....वे कई बार बता चुके पर मेरी समझ नहीं आता.....
सुनील भैय्या   हमारे सामने रहते है ..........दस दिन पहले ही उनकी शादी हुई है ..मेरे प्लास्टर वाले दिन...शादी में उन्हें टेप मिला है .....पिछले छह दिन से वो सुबह से एक ही केसेट चला देते है ....सनम तेरी कसम .....मुझे गाने याद हो गए है ....नयी भाभी को मैंने दो बार देखा है. ...उन्हें दूसरा  कमरा  मिल गया है ....जब मां आँगन में मुझे नहलाती है ...तो वो भी  अपनी खिड़की से मुझे देख मुस्कराती है .. उनके .माथे पर बड़ी बड़ी बिंदी.है......हाथ में.ढेर सारी चूडिया  है  .....माँ तुम ऐसी बिंदी क्यों नहीं लगाती....मै मां से कहता हूं तो मां डांट कर चुप करा देती है..मै  रोज मां को  बाथरूम में  नहलाने को कहता हूं ...पर मां मानती नहीं ....
नीचे ब्लेकी पतंग से खेल रहा है ......फाड़ देगा ....मै खिड़की से" शै शै "करता हूं .......ब्लेकी सामने वाले होमियोपेथिक डॉ का कुत्ता है ...जब से  खुजली हुई   है  डाक्टरनी  उसे घर में घुसने नहीं देती है .पर ब्लेकी दिन रात यही रहता है.......रात को  घर में घुसने को  कूं कूं  करता है...पहले मुझे  उससे डर लगता था .... आजकल  वो मेरे  बिस्कुट का पार्टनर है .........डॉ अंकल को मैंने दो बार   चुपके  से उसे रोटी  डालते  देखा है ... .... दूसरा गाना शुरू हो गया है ....निशा आ हा आ हा .....
 बिट्टू आया है ...बिट्टू कभी मेरे घर पर अपना गेम लेकर  नहीं आता ...इन दिनों माँ कोई भी  चीज़ मांगने पर घर में सबको एक  ही बात कहती   है ....कहती है" मकान बन रहा है ."...मुझे समझ नहीं आता के मेरे गेम के आने सेमकान का क्या सम्बन्ध है ...
 आज प्लास्टर उतरने का दिन है ...काटने वाले की मशीन से मुझे डर लगता है के कही वो मेरा पैर ही न काट दे ...कितना पतला पैर निकला  है .सूखा सा .माँ रोज पैर पे  तेल की मालिश करती है ....सर्दिया  आने लगी है ....एक महीना गुजर गया है....मुझे बड़ी  साइकिल से डर लगता है ...मुझे  बिट्टू जैसी छोटी   साइकिल  चाहिए  भले ही उसपे  घंटी न हो ....  . टोकरी न  बनी हो ....पर छोटी   हो......मकान फिर बीच में आ जाता है ...मेरी मां से लड़ाई हुई है ....
पापा  रोज दिल्ली से रात में आते है ..उनका ऑफिस  दिल्ली में जो है .....मै रजाई में दुबका हूँ .आंख मीच कर ..वो रोज  की तरह खाना खाकर .  कागजो में उलझे   है ..अपनी खाकी फाइल  लेकर .....वो फाइल  पापा हमेशा ताले में रखते है ...सन्डे को  सारा दिन उनके साथ रहती है ....उसमे अजीब से कागज है ...पोस्ट ऑफिस ...ऐसे  से  कुछ ....माँ कुछ मेरी साइकिल की बात कर रही है ....मेरे कान मुड गये है .....पापा सिर्फ हां -हूं में जवाब दे रहे है .थक कर .मै सो गया  हूं.....
उन सर्दियों  का रविवार ...दोपहर ढाई बजे ...
पापा ने मुझे आवाज दी है ..उनके पास एक नयी साइकिल  खड़ी  है ...घंटी वाली .लाल ....उसके आगे टोकरी भी है ..."...वे मुझे साइकिल पर बैठा कर  खड़े है ....ब्रेक लगायो....ब्रेक वे पीछे से चिल्ला रहे है .....मै ब्रेक लगानी हमेशा भूल जाता हूं .....
साल २०१० का एक  रविवार सुबह नौ    बजे ......
मै चाय का कप हाथ में लिए बाहर आया हूं ...नीचे गली में .पापा आर्यन के  साथ उसकी साइकिल में पिछले आधे घंटे से उलझे है ..प्लास ओर चाभी लेकर  ..उसकी टोकरी ओर कोई नट बोल्ट ठीक कर रहे है ..थोड़ी देर में . साईकिल  फिट घोषित होती है . .....आर्यन घंटी बजा कर निकला है "ब्रेक लगायो....ब्रेक" पापा चिल्ला रहे है ....

सफ्हे दर सफ्हे कुछ देर   ठहरती  है .....
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ..कुछ हर्फ़ पलटती है .…. 
हर शब एक नज्म अपनी शनाख्त करती है
- Anurag Arya