बेतरतीब सी कई सौ ख्वाहिशे है ...वाजिब -गैरवाजिब कई सौ सवाल है....कई सौ सुबहे ... कई सौ शामे ... एक आध कन्फेशन भी है ...कुछ यादें भी है .. कुछ किस्से भी ... कुछ अपने हैं कुछ पराये से भी ...सबको सकेर कर यहां जमा कर रहा हूं..ताकि गुजरे वक़्त में खुद को शनाख्त करने में सहूलियत रहे ...
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07 July, 2011
रात फैली है
रात फैली है तेरे ‘सुरमई’ आँचल की तरह,
'चाँद' निकला है तुझे ढूँढने ‘पागल’ की तरह,
’ख़ुश्क' पत्तों की तरह लोग ‘उड़े’ जाते हैं,
शहर भी अब नज़र आने लगा ‘जंगल’ की तरह,
फिर ‘ख़यालों' में तेरे ‘क़ुर्ब' की ख़ुशबू जागी फिर ‘बरसने’ लगी आँखें मेरी ‘बादल' की तरह
’बे-वफाओं’ से ‘वफ़ा’ करते गुज़री है ‘हयात’
ये ‘बरसता’ रहा ‘वीराने’ पे ‘हलचल’ की तरह.........!!
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